A Hindi Poem Which Will take You Back To Your Childhood!

I wrote this poem on the joys of being a child, in August 2012 inspired by the antics of my nephew.

आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.
बारिश की बूंदों में आज घुल जाने दो.
साफ़ कपड़ों में वो बात कहाँ
आज इन्हें दाग से सजाने दो
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

तितली के पीछे मुझे भाग जाने दो 
आती है बेवजह हसी तो आने दो
ग़म से आज साबका हो 
सिर्फ खुशियों की गंगा में नहाने दो
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

बंसी काका की जलेबियों में उंगलियाँ डुबाने दो.
आज उंगलियाँ भिगोऊंगा , किसी को बीच में आने दो
वो बरगद का पेड़ बड़ा , उस पेड़ पर चढ़ जाने दो 
उस पेड़ की लम्बी मूछों पर झूल जाने दो 
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

आज बजाऊँगा तुम्हारे कान में बांसुरी 
करूँगा हंगामा और तमाशे एक दो
आज मैं फिर एक बच्चा हूँ 
मेरे नखरे उनको भी उठाने दो
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

मुंडेर पर पतंग की पींगे बढाने दो 
दोस्तों के सामने डींगे उड़ाने दो 
बच्चा , बड़ा , इंसान या जानवर 
मुझे निश्छल प्यार लुटाने दो
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

आज खरीद कर नहीं , चुरा कर आम खाने दो
मस्ती के रंग में आज डूब जाने दो
चोट और खरोंचो का डर किसे है
आज तो छड़ी भी पड़ती है तो पड़ जाने दो 
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

आज मैं नशे में हूँ ,
मुझे होश में आने दो
बड़ा हो कर क्या हासिल कर लिया 
आज मुझे बच्चा ही रह जाने दो 
आज मुझे रोको मत , मुझे बचपन दोहराने दो.

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WARNING : THIS POEM IS WRITTEN BY ABHINAV SINGH. ALL THE IMAGES HERE ARE SHOT BY HIM. COPYRIGHT TO ALL THE IMAGES AND TEXT HERE REMAINS WITH HIM. YOU CAN NOT JUST LIFT THE CONTENT AND USE IT WITHOUT HIS PERMISSION. STRICT LEGAL ACTION WILL BE TAKEN IF CONTENT IS STOLEN. 

YOU – A HINDI BREAK-OFF POEM THAT WILL MAKE YOU CRY!

Mumbai skyline (4)

I wrote this long back. Needless to say it’s a break off poem. Needless to say you will need handkerchief to read this. Many have cried when I shared this many moons ago. PLS DONT COPY PASTE THIS AND SHOW IT AS YOUR POEM, I WILL SEND POLICE AFTER YOU, I GUARANTEE.

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तुम…

मैदान में तनहा बैठ जब मसलता हूँ दूब को
उसकी खुशबु तेरी याद दिलाती है.
जब दूब में घात लगाये कोई काँटा चुभ जाए
यादें और पुरजोर हो जाती हैं.

वो पीपल का पेड़ याद है?
जो बारिश में चांदी सा चमकता था
और पतझड़ में हम पे बरसता था
आज गया था मैं वहाँ
हमने जो उसपे नाम कुरेदे थे उसको देखने

उस पल को एक बार फिर जीने
वो पेड़ मुझे एकटक देख रहा था
बेचैन सा, उदास सा…
पहले जैसा मुस्कुरा नहीं रहा था…
शायद वोह भी तुम्हे ढूंढ रहा था.
वो नजाकतें वो खिलखिलाहटे टटोल रहा था.

वोह चाय की प्याली भी शायद भूल गयी होगी?
जिसे झूठा करके तुम मुझे देती थी.
जिसे लबो से लगा के मैं अपने लब लाल करता था.
और फिर तुम बेबाक बेलगाम हस्ती थी..
वो प्याली भी आज उदास है.
मुददत हुई उस पे लाल स्याही जो नहीं चढ़ी.

वो चूड़ियों की दुकान आज भी मेरे रास्ते में पढ़ती है
जहाँ तुम घंटो लगाती थी लाल नीली हरी चुनने में
आज वहां ताला लग गया है.
उन चूड़ियों ने खनकना जो बंद कर दिया.

और वो सिगरेट के कश जो मुझसे छीन कर तुम पीती थी.
नजरें चुरा के , डर डर के पीती थी.
उस सुफेद पीली कलम में अब वो नशा नहीं रहा
उसमे हमारे अफसाना लिखने का अरमान अब नहीं रहा.

और वो मंदिर की घंटियाँ भी कितनी आसानी से भूल गयी?
जिन्हें बच्चों जैसे उचक उचक कर तुम बजाती  थी
फिर सहसा संजीदा हो कर आँखे मींचे
खुदा जाने क्या दुआएँ मांगती थी
उस मंदिर में अब कहाँ कोई आता जाता है
लोगो का दुआओं से विश्वास जो उठ गया…

क्या जवाब दूं मैं इन्हें
क्या समझाऊं और क्या फुस्लाऊं?
अब मैं इस काबिल ही कहाँ रहा
की खुद कुछ समझ पाऊं….

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